FARIDABAD

HindustanVision Sunday,26 July , 2026
जनकल्याण हेतु फरीदाबाद में खुल चुका है समभाव-समदृष्टि का निःशुल्क स्कूल

FARIDABAD NEWS 26 NJULY 2026 ; GAUTAM : भूपानी-ललपुर रोड स्थित सतयुग दर्शन ट्रस्ट के प्रतिनिधियों ने जनहित में शुभ संदेश देते हुए बताया कि कुदरत के हुकुम अनुसार व युग परिवर्तन के खेल को दृष्टिगत रखते हुए सतयुग दर्शन ट्रस्ट द्वारा विश्व का प्रथम निःशुल्क समभाव- समदृष्टि का स्कूल 'ध्यानकक्ष', जो भारत सरकार के इनक्रेडिबल इंडिया पोर्टल पर सूचीबद्ध तथा हरियाणा पर्यटन द्वारा पर्यटन स्थल के रूप में शामिल किया गया है,वर्ष 2014 से संचालित है। यहाँ से युवा अवस्था के स्वतंत्र भक्ति भाव अनुसार हर मानव की मानसिकता ढाल उसे सत्य धर्म का परिचायक बनाने के प्रति विधिवत प्रयास किए जाते हैं। समभाव-समदृष्टि की महिमा का वर्णन करते हुए उन्होंने इसे दिव्यता, आत्मबोध और परमानंद की ओर ले जाने वाली सुगम व सहज युक्ति बताया। जानो विवेकप्रद अमोलक मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल सांसारिक उपलब्धियाँ अर्जित करना नहीं, बल्कि अपने वास्तविक आत्म-स्वरूप की पहचान कर परमानन्द को प्राप्त होना है। सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में वर्णित समभाव- समदृष्टि की सर्वश्रेष्ठ युक्ति के अनुशीलन द्वारा स्वयमेव आत्मज्ञान की अग्नि में अज्ञानता का नाश कर व आत्मविस्मृति से आत्मस्मृति में आ ‘ईश्वर है अपना आप प्रकाश’ के विचार का सत्य बोध कर लेता है। ऐसा कमाल होने पर वह आत्मबोधी अपने मन-वचन-कर्म द्वारा जो कुछ भी करता है अध्यात्म भाव से ही करता है।यहाँ समभाव से तात्पर्य जीवन की हर परिस्थिति यथा जन्म-मरण, रोग-सोग,
खुशी-गमी, मान-अपमान, अमीरी-गरीबी आदि में समान प्रकृति व भाव से युक्त हो सदा एकरस बने रहने से है तथा समदृष्टि से आशय चराचर जगत को अपने-पराए, जात-पात, अमीरी-गरीबी, ऊँच-नीच की भेद-बुद्धि से रहित होकर, एकरूपता से देखने से है। कहने का तातपर्य यह है कि समभाव समदृष्टि का सबक
जो भी मानव अपने मन वचन कर्म द्वारा आत्मसात करने में समर्थ हो जाता है वह अपने जीवन काल में किसी विध भी बहिर्मुखता नहीं अपनाता। परिणामतः सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सर्व्यापकता और सर्वज्ञता के सत्य को स्वीकारते हुए अंदरूनी वृति द्वारा आत्मभाव अपना व अपने स्वभाव के अंतर्गत कर समभाव समदृष्टि की युक्ति यानि युवा अवस्था के भक्ति भाव पर सदा स्थिरता से बना रहता है। परिणामतः वह त्रेता, द्वापर और कलियुग के बाल अवस्था के मनगढ़ंत भक्ति भाव न अपना किसी की भी अधीनता नहीं स्वीकारता यानि हर क्षण अपनी मानसिकता को जगत से आज़ाद रखने में समर्थ होता है।समभाव - समदृष्टि की स्वतंत्र युक्ति के अंतर्गत अद्वैत भाव का चलन चलता है यानि इसके तहत् परम सत्ता ब्रह्म को ही एकमात्र सत्य एवं सर्वमूल तत्व माना जाता है और यह समझा जाता है कि इसके अतिरिक्त बाकी सब जो प्रतीत हो रहा है वह सब मिथ्या है। तभी तो इसका साधक ब्रह्म और जीव को अभेद मानकर,ऐक्य भाव अपनाता है और एक ख़्याल, एक दृष्टि, एक दृष्टि एक दर्शन में स्थित हो निष्कामता पूर्वक जगत में विचरता है। इस तरह इंसान अपने वास्तविक दिव्यता के प्रतीक ज्ञान, गुणों व शक्ति का बोध कर सच्चा आत्मसंतोष प्राप्त कर लेता है और एक धीर इंसान की तरह शाश्वत भाव से सर्वहित के निमित्त निर्विकारी जीवन जीने में समर्थ हो, पूरी तरह ब्रह्म स्वरूप प्रकाश है जे ओ मेरा अपना के सत्य परस्थिर हो अमरता का प्रतीक बन जाता है। इस सुगम युक्ति के अंतर्गत साधक ओ३म् आद अक्षर यानि शब्द को गुरु मानकर व ख़्याल को ध्यान वल व ध्यान को आत्मप्रकाश के स्त्रोत के साथ अफुरता से जोड़ अपने वास्तविक ज्योति स्वरूप जो है अपना आप की पहचान कर रोशन हो जाता है। ऐसा कमाल होने पर उस विवेकशील इंसान का हृदय विशालता का प्रतीक बन सत्य के प्रकाश से भरपूर हो सचखंड हो जाता है। ए विध मन में द्वैत- भाव का अभाव व ऐक्य भाव की प्रधानता होने के कारण जैसे ही युवावस्था का भक्ति भाव स्थिर हो जाता है तो द्वि-द्वेष जैसी असद् भावनाओं का स्वयमेव नाश हो जाता है। तभी तो इसको धारण करने वाला निर्वैर, निष्कलंक सजन खालस सोने की भांति खरा व ईश्वर का उत्तम सुपुत्र होने के साथ-साथ परस्पर सजन भाव का वर्त-वर्ताव सत्यतापूर्ण करना अपना धर्म समझता है। तभी तो समस्त दोषों, बुराईयों और त्रुटियों से मुक्त हो वह हर हाल में शांत व आनन्दमय बना रहता है
तथा आत्मनिर्भर हो कर आत्मविश्वास के साथ जगत में बेखौफ़ा बेखतरा स्वतन्त्रतापूर्ण विचरता है।
ज्ञात हो - सृष्टि के सर्वोत्कृष्ट आदि काल यानि सतयुग में जब मन में किसी प्रकार का कोई संकल्प नहीं उठता , तब समभाव-समदृष्टि महान होती है अर्थात् सब सत्-चित्त-आनन्द स्वरूप सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान व सर्वज्ञ परमेश्वर से जुड़े रहते हैं। और तो और यह युक्ति सबको आत्मीयता के भाव से ओत-प्रोत कर, एकता-एक अवस्था व एकरसता के सूत्र में पिरो देती है और प्रत्येक मानव को वास्तविक अर्थों में सजन-पुरुष बना देती है। तभी तो इसके प्रभाव से नौजवान युवा अवस्था आ जाती है और उच्च बुद्धि, उच्च ख़्याल, भक्ति प्रबल व शक्ति ताकतवर हो जाती है। निश्चित रूप से अब आप कहोगे कि वर्तमान युग यानि कलियुग के कलुषित वातावरण में जहाँ समाज रूढ़िवादी धार्मिक मान्यताओं व कट्टरपंथी परंपराओं व जीवन मूल्यों का शिकार है, वहीं सजनता का प्रतीक बनना कठिन प्रतीत होता है।

तो जानो कलियुगवासियों की इस समस्या को पूर्वत: ही भाँप कर, समय पर इसका निवारण करने हेतु ही कुदरत द्वारा जगह-जगह समभाव-समदृष्टि के निःशुल्क स्कूल खोलने व उसके अंतर्गत सजन भाव की पढ़ाई कराने का विधिवत् विधान रखा गया है। आगे जानो कि समभाव-समदृष्टि की महिमा केवल आंतरिक अनुभूति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि साधक की दृष्टि और व्यवहार में भी स्पष्ट रूप से प्रकट
होने लगती है। उसकी जिह्वा सजन, ख्याल सजन यहाँ तक की सारा ब्रह्मांड एक सजन हो जाता है। जिसके फलस्वरूप जहाँ उसका मन शांत और प्रीत निर्मल होती है वहीं उस सार्थकता के प्रतीक का ख्याल सात्विक व सकरात्मक हो जाता है। फलतः अंदरूनी व बेहरूनी वृति स्वच्छ हो जाती है। ऐसा साधक सदा वर्तमान में स्थिर रह तथा कष्ट-क्लेश, दुःख-सुख आदि में एक समान यानि अडोल अवस्था में स्थित रहने में समर्थ बन जाता है। यही नहीं आत्मिक रूप से मालोमाल वह ओजस्वी व तेजस्वी सजन संसारी व परमार्थी दोनों राज्य प्राप्त कर लेता है। ऐ विध काम पर फतह पा ब्रह्म नाम कहाता है। यहाँ गौर करने की बात है कि इस बेमिसाल युक्ति में वृत्ति मौन की होती है। मौन वृत्ति अपनाकर ही साधक, सहज ही विश्राम अवस्था में आ आत्मपद प्राप्त कर लेता है और तीनों तापों यथा आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक से विमुक्त हो जाता है। इस तरह वह परमार्थी अमरता के भाव से जीवनयापन करते
हुए मृतलोक पर फतह पा, प्रकाश नाल प्रकाश हो जाता है। इस तरह उसकी सुरत कंचन हो शब्द से मेल खा ऐक्य-भाव में खड़ी हो जाती है और संकल्प रहित अवस्था में आ उस दिव्य अवस्था तक पहुँच जाती है जहाँ पहुँच कर वह दिव्य दृष्टि द्वारा जेहड़ी गुजर गई, जेहड़ी इस वक्त, जेहड़ी आने वाली का सहज ही
ज्ञान प्राप्त कर लेता है। यह है त्रिकालदर्शी हो सर्गुण-निर्गुण के खेल खेलते हुए निर्वाण-परमधाम में स्थिर हो जाना। इस तरह परब्रह्म की सार को पा वह सजन जगत में विचरते हुए भी उससे निर्लिप्त बना रहता है। अंत में हम तो यही कहेंगे कि समभाव समदृष्टि की इस महिमा के दृष्टिगत आप भी आत्मोद्धार हेतु संकीर्ण व विषम भावों को त्याग कर समभाव समदृष्टि के निःशुल्क स्कूल में अविलम्ब परिवार व मित्रों सहित दाखिला लो व वहाँ से प्राप्त होने वाली युक्ति अनुसार सबके प्रति आत्मभाव अपनाओ। जानो यह घर,परिवार व समाज को सतयुग बनाने की बात है क्योंकि इस युक्ति के अनुशीलन द्वारा ही जगत में पुनः एकता व शांति की स्थापना हो सकती है। आओ ऐसा पुरुषार्थ दिखा व निर्विकारिता के प्रतीक बन भारत माता को हर्षा दें। सबकी जानकारी हेतु इस समभाव समदृष्टि के निःशुल्क स्कूल से जुड़ने हेतु ,
9899891624, 9871405300 पर सम्पर्क करें व ट्रस्ट की अन्य गतिविधियों से जुड़ने हेतु SATYUG DARSHAN TRUST एप (जो की प्लेस्टोर व एप्प स्टोर पर उपलब्ध है) डाउनलोड करें।

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