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Thursday,17 September , 2026
FARIDABAD NEWS 17 SEP 2026 : GAUTAM : जनमत का सम्मान लोकतंत्र, नीति का सम्मान ही सतयुग,। " यह केवल एक विचार नहीं, बल्कि भारतीय शासन-दर्शन का मूल सिद्धांत है। यदि इन दोनों के बीच संतुलन बना रहे, तभी आदर्श समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। इस सत्य का सर्वोत्तम उदाहरण भगवान श्रीराम के जीवन में मिलता है। यह शब्द मिशन जॉर्नलिस्ट प्रोटेक्शन, भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु चौहान ने एक धार्मिक कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहें।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में भगवान श्रीराम केवल एक राजा नहीं, बल्कि मर्यादा, नीति, सत्य और कर्तव्य के सर्वोच्च प्रतीक हैं। उनके जीवन का प्रत्येक प्रसंग मानव समाज को यह सिखाता है कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, धर्म और नीति का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अयोध्या का वह ऐतिहासिक क्षण भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा नैतिक उदाहरण है, जब महाराज दशरथ के निधन के बाद भरत, गुरु वशिष्ठ, सभी मंत्री, माताएँ, अयोध्या के गणमान्य नागरिक और विशाल जनसमूह चित्रकूट पहुँचे। सभी की एक ही प्रार्थना थी—भगवान श्रीराम अयोध्या लौट चलें और राजसिंहासन संभालें।
यह केवल कुछ लोगों की इच्छा नहीं थी, बल्कि सम्पूर्ण अयोध्या का जनमत था। राज्य, समाज, परिवार और गुरु—सभी श्रीराम के पक्ष में खड़े थे। यदि वे चाहते, तो उसी क्षण अयोध्या लौटकर राजा बन सकते थे। किसी को कोई आपत्ति नहीं होती।
किन्तु श्रीराम ने कहा—"मैं पिता के वचन से बंधा हूँ। चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण किए बिना अयोध्या लौटना मेरी मर्यादा और धर्म के विरुद्ध होगा।"
यही वह क्षण था, जहाँ जनमत और नीति आमने-सामने खड़े थे। जनमत उन्हें वापस बुला रहा था, लेकिन नीति उन्हें वन में रहने का आदेश दे रही थी। श्रीराम ने जनभावना का अनादर नहीं किया, बल्कि उससे भी ऊपर उठकर धर्म और नीति का सम्मान किया। क्योंकि वे जानते थे कि यदि शासक स्वयं नियम तोड़ देगा, तो समाज में नियमों का सम्मान समाप्त हो जाएगा।
इसीलिए भगवान श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि लोकप्रिय होना और सही होना, दोनों हमेशा एक जैसे नहीं होते। कभी-कभी सच्चा नेतृत्व वही होता है जो तत्काल लोकप्रिय निर्णय छोड़कर दीर्घकालीन नैतिक निर्णय ले।
आज के लोकतंत्र में जनमत का सम्मान सर्वोपरि है, क्योंकि लोकतंत्र जनता की इच्छा पर आधारित व्यवस्था है। परंतु जनमत भी संविधान, न्याय और नैतिक मर्यादाओं के भीतर ही फलता-फूलता है। यदि नीति और कानून की उपेक्षा कर केवल जनभावना के आधार पर निर्णय होने लगें, तो व्यवस्था अराजकता में बदल सकती है।
इसलिए भगवान श्रीराम का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—सत्ता से पहले सत्य, लोकप्रियता से पहले नीति और अधिकार से पहले कर्तव्य।
जब समाज में नीति का सम्मान सर्वोच्च होता है, तब सतयुग जैसे आदर्श जन्म लेते हैं। और जब लोकतंत्र में जनमत का सम्मान संविधान और नीति की मर्यादा के साथ किया जाता है, तभी राष्ट्र सशक्त, न्यायपूर्ण और समृद्ध बनता है।
भगवान श्रीराम का जीवन हमें यही अमर संदेश देता है कि परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन सिद्धांत कभी नहीं बदलने चाहिए। यही मर्यादा है, यही धर्म है और यही आदर्श नेतृत्व की पहचान है।
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