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NEW DELHI NEWS 08 DEC 2024 : GAUTAM ; विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रमुख पत्रकारिता प्रकाशन 'नियमन रिपोर्ट्स' (Nieman Reports) ने भारतीय डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म द मूकनायक और इसकी संस्थापक, पत्रकार मीना कोटवाल के साथ BBC हिंदी में जाति के आधार पर हुए भेदभाव और उनके संघर्ष पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है. यह रिपोर्ट भारत में वंचित-शोषित और हाशिए पर खड़े समाज के पत्रकारों और उनकी चुनौतियों को रेखांकित करता है.
ग़ौरतलब है कि 2019 में पत्रकार मीना कोटवाल ने अपने तत्कालीन संस्थान बीबीसी हिंदी पर जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया था. जिसके बाद भारतीय मीडिया में दलित-आदिवासियों के प्रतिनिधित्व का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठा था. मीना कोटवाल दलित समाज से आती हैं और उन्होंने अपने संस्थान बीबीसी हिंदी पर आरोप लगाया था कि दलित होने की वजह से उनके साथ बीबीसी में भेदभाव हुआ है, इसकी वजह से उन्हें अपनी नौकरी भी गँवानी पड़ी.
'नियमन रिपोर्ट्स' में इस मामला पर विस्तार से बात की गई है. मीना कोटवाल, बीबीसी हिंदी और पूर्व संपादक का पक्ष इस रिपोर्ट में शामिल किया गया है. तत्कालीन बीबीसी रेडियो संपादक राजेश जोशी ने माना है कि मीना कोटवाल के साथ जाति के आधार पर भेदभाव हुआ है. राजेश जोशी, जो पहले बीबीसी में संपादक के तौर पर कार्यरत थे और जिन्हें कोटवाल के मार्गदर्शक के रूप में नियुक्त किया गया था, कहते हैं कि बीबीसी में उनके खिलाफ "कानाफूसी अभियान" (Whisper Campaign) चलाया गया था.
राजेश जोशी के मुताबिक़, उनके सहकर्मी मीना कोटवाल की पत्रकारिता पर टिप्पणियां करते थे और कहते थे कि उनकी अंग्रेजी और अनुवाद कौशल कमजोर है. जोशी कहते हैं, "उन्हें न्यूज़रूम में एक तरह से अलग-थलग कर दिया गया था.” उन्होंने आगे कहा, "मुझे लगता है कि इसमें जाति ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जाहिर है, ये बातें सीधे तौर पर नहीं की जातीं. कोई आपको यह नहीं कहेगा कि आप दलित जाति से हैं, इसलिए आपके साथ भेदभाव किया जा रहा है, ऐसा नहीं होता. यह बहुत ही सूक्ष्म और अप्रत्यक्ष तरीके से होता है.”
2021 में स्थापित द मूकनायक का उद्देश्य हाशिए पर पड़े समुदायों—विशेषकर दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग, महिलाएं और अल्पसंख्यकों, की समस्याओं और संघर्षों को मुख्यधारा में लाना है. यह समाचार मंच उन विषयों पर प्रकाश डालता है जिन्हें मुख्यधारा की मीडिया अमूमन अनदेखा कर देती है. द मूकनायक अपनी रिपोर्टिंग के माध्यम से समाज में बराबरी, न्याय और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का प्रयास करता है.
द मूकनायक का नाम डॉ. भीमराव अंबेडकर के ऐतिहासिक प्रकाशन 'मूकनायक' से प्रेरित है, जो सामाजिक न्याय और समानता के लिए एक प्रतीक है. 1920 में प्रकाशित मूकनायक ने भारतीय समाज में व्याप्त भेदभाव और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई थी. इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए, द मूकनायक आधुनिक भारत में हाशिए के समुदायों की आवाज़ बनने और उनके मुद्दों को मुख्यधारा में लाने के लिए अपनी भूमिका निभा रहा है.
नियमन रिपोर्ट्स में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, द मूकनायक का नेतृत्व करते हुए संस्थापक संपादक मीना कोटवाल ने जातिगत भेदभाव और धमकियों का सामना करते हुए अपने पत्रकारिता को जारी रखा. उन्होंने समाज के वंचित तबकों की आवाज़ को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का काम किया. उनके साथ उनकी टीम के पत्रकार अंकित पचौरी और राजन चौधरी की भी कुछ रिपोर्ट्स की चर्चा की गई है. उनकी पत्रकारिता में दलित, आदिवासी और महिलाओं के अधिकारों के मुद्दों को प्रमुखता दी गई है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि द मूकनायक ने बीते वर्षों में उन मुद्दों को उजागर किया है, जो मुख्यधारा की मीडिया में अमूमन अनदेखे रह जाते हैं. इनमें जातिगत भेदभाव, ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की समस्याएं, आदिवासी समुदायों की ज़मीनों पर कब्ज़ा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, और अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे अन्याय जैसे विषय शामिल है. खासतौर पर, द मूकनायक ऐसी घटनाओं को सामने लेकर आया है, जिन्हें अक्सर दबाने की कोशिश की जाती है. इन रिपोर्ट्स ने न केवल सरकारी नीतियों की खामियों को उजागर किया, बल्कि प्रशासन और समाज को जवाबदेह बनाने का काम भी किया.
इसके अलावा, द मूकनायक ने दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों के संघर्षों और उपलब्धियों पर भी रोशनी डाला है. रिपोर्ट के अनुसार, इसने वंचित समुदायों के लिए एक मंच प्रदान किया, जहां वे अपनी कहानियां खुद बयां कर सकें. इस मीडिया प्लेटफॉर्म ने कई बार बड़ी सामाजिक और राजनीतिक हलचलें पैदा की हैं, जिससे सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में सकारात्मक बदलाव को बढ़ावा मिला है.
द मूकनायक के कुछ रिपोर्ट्स जिन्हें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रमुख पत्रकारिता प्रकाशन 'नियमन रिपोर्ट्स' में जगह दी गई है-
1. दलित महिलाओं के खिलाफ हिंसा: 2021 में दिल्ली में 9 वर्षीय दलित बच्ची के बलात्कार और हत्या की घटना पर द मूकनायक की रिपोर्टिंग ने न केवल जनता का ध्यान आकर्षित किया, बल्कि इस मामले में न्याय की प्रक्रिया को भी तेज किया.
2. श्रमिकों की दुर्दशा: मध्य प्रदेश के खदान मजदूरों की खतरनाक परिस्थितियों पर विशेष रिपोर्ट ने सरकार को सुरक्षा उपायों में सुधार के लिए मजबूर किया.
3. शैक्षणिक असमानता: ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्कूलों की दुर्दशा और बच्चों की शिक्षा में बाधाओं को अंकित पचौरी और राजन चौधरी ने अपनी गहरी शोधपूर्ण रिपोर्टिंग के माध्यम से सामने रखा.
4. आर्थिक और सामाजिक मुद्दे: महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं, जातिगत अत्याचार और भ्रष्टाचार पर द मूकनायक की रिपोर्टिंग ने सरकारी योजनाओं में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
हार्वर्ड की रिपोर्ट का महत्व : 'नियमन रिपोर्ट्स' ने द मूकनायक की पत्रकारिता को "भारत में सामाजिक बदलाव के लिए डिजिटल मीडिया का उपयोग करने का प्रेरणादायक उदाहरण" बताया है. रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे इस प्लेटफॉर्म ने उन समुदायों को आवाज़ दी है, जिनकी समस्याओं को अब तक दबाया गया था.
रिपोर्ट में बताया गया है, "द मूकनायक सिर्फ एक मीडिया प्लेटफॉर्म नहीं है, यह एक सामाजिक आंदोलन है, जिसने पत्रकारिता को हाशिए पर पड़े लोगों की आवाज़ बनने के लिए एक शक्तिशाली माध्यम बना दिया है.”
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